सारगढ़ी जंग : ‘जो बोले सो निहाल…’ का नारा लगाते हुए जब ये बहादुर जवान हज़ारों दुश्मनों से भीड़ पड़ा

 

अक्षय कुमार सारगढ़ी के युद्ध पर आधारित फिल्म ‘केसरी’ नज़र आएंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं आखिर ये सारगढ़ी युद्ध क्या है? क्या है इस युद्ध का इतिहास? क्यों सारगढ़ी युद्ध को विश्व की श्रेष्ट आठ लड़ाइयों में से एक माना जाता है? यह सब जानने से पहले यह जानना जरुरी है कि सारगढ़ी की जंग ने कुर्बानी और वीरता की एक नई इबारत लिखी थी। सारगढ़ी युद्ध देशभक्ति, अपरिमित शौर्य और उत्साह से लबरेज़ 21 सिखों की बहादुरी कि एक महान कहानी है।

इतिहास के सुनहरे पन्नों से जब इस जंग की बात की जाये तो कहा जाता है कि उस जंग में मात्र 21 सिख हज़ारों दुश्मनों पर भारी पड़ गए थे। सारगढ़ी पश्चिमोत्तर सीमांत (अब पाकिस्तान) में स्थित हिंदुकुश पर्वतमाला की समाना श्रृंखला पर स्थित एक छोटा गांव है। 119 साल पहले हुए युद्ध में सिख सैनिकों के शौर्य और साहस ने इस गांव को इतिहास के पन्नों में हमेशा हमेशा के दर्ज़ कर दिया।

इतिहास के मुताबिक ब्रिटिश शासनकाल में सारगढ़ी चौकी पर यहाँ 36 सिख रेजीमेंट तैनात थी। यह चौकी गुलिस्तान और लाकहार्ट के किले के बीच में स्थित थी। सारगढ़ी चौकी इन दोनों किलों के बीच एक कम्यूनिकेशन नेटवर्क का काम करती थी।1897 में अफगानों की सेना ने ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध असंगठित रूप से किले पर दर्जनों हमले किए। लेकिन अंग्रेजों की तरफ से देश के लिए लड़ रहे सिख वीरों ने उनके सारे आक्रमण हर बार विफल कर दिए। लगातार हार से नाराज़ अफगानों ने एक दिन अचानक 12 से 15 हजार दुश्मनों के साथ लॉकहार्ट के किले को चारों तरफ से घेर लिया।

 

 

 

युद्ध की स्थिति को देख सिग्नल इंचार्ज गुरुमुख सिंह ने लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन हॉफ्टन को हेलोग्राफ पर सारा ब्योरा दिया। लेकिन किले तक कोई मदद नहीं पहुंचाई जा सकी। लेकिन सिख वीरों ने आत्मसमर्पण करने की बजाय युद्ध करना स्वीकार किया। गंभीर स्थिति को देखते हुए लांसनायक लाभ सिंह और भगवान सिंह ने अपनी रायफल उठा ली और अकेले ही जंग लड़ने का फैसला किया। दोनों बहादुर सैनिक शत्रुओं को गोली से भूनते हुए आगे बढ़रते रहे। लेकिन भगवान सिंह को अचानक गोली लग गई और वो शहीद हो गए।

इसके बाद तो दुश्मनों के कैम्प में हडकंप मच गया। लेकिन दुश्मनों अबकी बार किले पर कब्जा करने के लिए दीवार तोड़ने की कोशिशें कीं जिसे हवलदार इशर सिंह ने नाकाम कर दिया। ईशर सिंह ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” का नारा लगाते हुए दुश्मनों पर झपट पड़े और 20 से अधिक दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया।

इसके बाद आख़िरी सांस तक बहादुर जवान लड़ते रहे। और लड़ते-लड़ते सुबह से रात हो गई और आखिरकार सभी 21 रणबांकुरे शहीद हो गए। लेकिन उन 21 वीरों ने करीब 500 से 600 लोगों का शिकार किया। इसके बाद दुश्मन बुरी तरह थक गए जिसके कारण वे ब्रिटिश आर्मी से अगले दो दिन में ही हार गए। यह जंग इन महान वीरों के लिए हमेशा याद की जाती रहेगी।

 

 

 

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